बुधवार, मई 04, 2016
कुछ और
भीढ़ में मैंने खुद को कुछ बहलाया था
तुझसे और तेरी यादों से दूर जाने का
एक मनचला बहाना बनाया था
दूर तुमसे, पंछी की तरह उढ़ने
का छोटा सा सपना भी दिखाया था
कदम न जाने किन नयी राहों पर
चलते रहे तमाम दिन और तमाम रात
मैंने खुद को नए धागों में देख
किस कदर उलझाया था,
मगर कल शाम लौ तले देखा
तो खवाबों के सिरहाने तुम
वही थे मेरा इंतजार करते और
शाम ढले बाँहों में लेकर मुझे
उसी बेखुदी से प्यार करते.....
तुझसे और तेरी यादों से दूर जाने का
एक मनचला बहाना बनाया था
दूर तुमसे, पंछी की तरह उढ़ने
का छोटा सा सपना भी दिखाया था
कदम न जाने किन नयी राहों पर
चलते रहे तमाम दिन और तमाम रात
मैंने खुद को नए धागों में देख
किस कदर उलझाया था,
मगर कल शाम लौ तले देखा
तो खवाबों के सिरहाने तुम
वही थे मेरा इंतजार करते और
शाम ढले बाँहों में लेकर मुझे
उसी बेखुदी से प्यार करते.....
मंगलवार, अप्रैल 26, 2016
तुम्हारे निशान
मेरे कंधे के सिरे पर अभी भी निशाँ है तुम्हारे
और उंगलियों कि नरमी तुमसे मिलती
आँखे नादाँ सी करती हैं इंतजार और
दिल याद करता है तुम्हारा स्पर्श बार बार
क्यों याद आती है तुम्हारी ठगती आँखें
जबकि मुझ को भी पता है तुम हो मीलो दूर
मगर प्यार को नहीं पता दूरी क्या होती है
तुमसे मिलती और हवा में भुरती
सपनो के न मिलने कि मजबूरी क्या होती है
सोचती हूँ मैं काश मैं वक़्त पकढ़ लेती और
उसमे तुम्हे बांध कर सिरहाने रख लेती
ताकि खुशबू बिखरती रहे तुम्हारी
और तुम रमते रहो मुझ में ..............
और उंगलियों कि नरमी तुमसे मिलती
आँखे नादाँ सी करती हैं इंतजार और
दिल याद करता है तुम्हारा स्पर्श बार बार
क्यों याद आती है तुम्हारी ठगती आँखें
जबकि मुझ को भी पता है तुम हो मीलो दूर
मगर प्यार को नहीं पता दूरी क्या होती है
तुमसे मिलती और हवा में भुरती
सपनो के न मिलने कि मजबूरी क्या होती है
सोचती हूँ मैं काश मैं वक़्त पकढ़ लेती और
उसमे तुम्हे बांध कर सिरहाने रख लेती
ताकि खुशबू बिखरती रहे तुम्हारी
और तुम रमते रहो मुझ में ..............
सोमवार, अप्रैल 25, 2016
जिंदगी
आज सुबह फिर खोजे मैंने
सारे निशाँ उसके और मेरे
हाथ आये चंद धागे तुमसे बंधे
बटोरे फिर मैंने सारे ख़वाब और
बांधे काले तावीज़ मन्नत से बंधे
कही ख़वाब को भी नज़र न लगे
आखिर वही तो पास हैं मेरे
तुम्हारी धरोहर संजोये हुए
हर दिन की बात शाम हो जाती है
जिंदगी जो जलती थी शाम के
साये में रौशनी की तरह
देख तेरे जाने के बाद कैसे
आम सी हो जाती है................
सारे निशाँ उसके और मेरे
हाथ आये चंद धागे तुमसे बंधे
बटोरे फिर मैंने सारे ख़वाब और
बांधे काले तावीज़ मन्नत से बंधे
कही ख़वाब को भी नज़र न लगे
आखिर वही तो पास हैं मेरे
तुम्हारी धरोहर संजोये हुए
हर दिन की बात शाम हो जाती है
जिंदगी जो जलती थी शाम के
साये में रौशनी की तरह
देख तेरे जाने के बाद कैसे
आम सी हो जाती है................
रविवार, अप्रैल 10, 2016
तुम्हारी नज़र
देखी थी कल देर शाम ढले मैंने
हम दोनों के बीच पनपती तढ़प
खनकती हँसी के बीच आँखों की वो
अनकही सी, मेरे लिए तुम्हारी कसक
हसरते बचाती रही दामन चुपचाप
पयालियो की पैनी निगाहों से मगर
भुरती रही मुझ में वो तुम्हारी
मरमरी संगमरमर सी नजर
मानों नज़र को तुम्हारी अँधेरा
छिपाना आता है और फिर
चमकती रौशनी में मुझे चुराकर
खुद में मिलाना आता है .......
हम दोनों के बीच पनपती तढ़प
खनकती हँसी के बीच आँखों की वो
अनकही सी, मेरे लिए तुम्हारी कसक
हसरते बचाती रही दामन चुपचाप
पयालियो की पैनी निगाहों से मगर
भुरती रही मुझ में वो तुम्हारी
मरमरी संगमरमर सी नजर
मानों नज़र को तुम्हारी अँधेरा
छिपाना आता है और फिर
चमकती रौशनी में मुझे चुराकर
खुद में मिलाना आता है .......
शुक्रवार, मार्च 25, 2016
पानी का अस्तित्व
मुझे हलके से आज फिर
याद आता रहा वो स्पर्श
अपना सा लगा था मुझे
वो अर्श, लेकिन अचानक
हवा न जाने क्यों रुखी थी
शायद समझ ही नहीं पाई वो
कैसा होता है दूर तक चांदनी सा
फैला जीवन का स्पर्श
आपको सहलाता और सवांरता
फिर करीने से बेल सा उकारता
सपनों का एक नया अर्थ, मानों
आपके आस्तित्व को किसी ने
पानी बना दिया और उसे एक दिन
समुन्दर में मिला दिया ताकि
हर दिन के साथ मिलता रहे
इस जिंदगी को एक नया अर्थ
याद आता रहा वो स्पर्श
अपना सा लगा था मुझे
वो अर्श, लेकिन अचानक
हवा न जाने क्यों रुखी थी
शायद समझ ही नहीं पाई वो
कैसा होता है दूर तक चांदनी सा
फैला जीवन का स्पर्श
आपको सहलाता और सवांरता
फिर करीने से बेल सा उकारता
सपनों का एक नया अर्थ, मानों
आपके आस्तित्व को किसी ने
पानी बना दिया और उसे एक दिन
समुन्दर में मिला दिया ताकि
हर दिन के साथ मिलता रहे
इस जिंदगी को एक नया अर्थ
सोमवार, मार्च 21, 2016
फिर न कहना
फिर न कहना तुम मुझे कि
वो पल रूठ कर चले गए
फिर न कहना तुम मुझे
कि होठ मिले बिना ही रह गए
हाथ थामना चाहते थे मेरा हाथ
तमाम रात मगर ख्याल
अँधेरे में चुपचाप मिल गए
फिर न कहना तुम मुझे
कि मेरा तिल तुम्हे मिला ही नहीं
जबकि हकीकत है ये कि
तुम उस तरफ पलट कर
आये ही नहीं
पानी में मिल जायेंगे
ये ख्याल साल दर साल
फिर न कहना आकर
कानों में मेरे कि वो साल
बिन बरसे ही निकल गए
देखो...............................
फिर न कहना तुम मुझसे
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

