शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2016

आवाज


तुम्हारी आवाज मुझ तक पहुँचती रही
मीलों दूर से तुम्हारी याद हाथ थामे मेरा
साथ साथ चलती रही और सहलाती रही,
पैरो के निशान नापती हूँ कभी मैं तो कभी
आवाज़ की गहराई को, शायद इस इंतजार में
कि आवाज़ अचानक एक दिन पास में
आकर थम जाएगी ठीक वैसे जैसे
समुन्दर किनारे शंख में समुंदर की
आवाज़ की गहराई समां जाती है ........

कल शाम


कल शाम पानी की लकीरों पर तस्वीर उभरती रही
और यादों की हांड़ी में कुछ और यादें पकती रही
चाँद चांदनी पिरोता रहा रात भर, मोतियों की तरह
और मैं खोजती रही तिनके घरोंदे के लिये
तुम्हारे और मेरे .....सपने
सिलवटे तकिये की दिलाती रही तुम्हारी याद कुछ और
और अँधेरा अकेले होने का अहसास
कितना बुरा होता है अँधेरा,
सच का अहसास दिला जाता है जो
इतनी शफक सच्चाई से .....................

रविवार, जनवरी 24, 2016

उस दिन




क्या तुमने उस दिन लहरों की आवाज सुनी थी
लहरों के साथ बहती किश्ती की राह चुनी थी
पता तुम्हे भी नहीं है; अपने ही रास्ते का तो
फिर दिखावा क्यों? किस्मत को समझने का
जबकि किस्मत को भी पता है लकीरों का खेल
और उसमे दिन पर दिन उलझता लहरों की रेल
मीलों लम्बे आसमान को नापती हूँ मैं
क्योकिं मुझे याद आता है अभी भी
शाम ढले उन लहरों का मेल



शुक्रवार, जनवरी 15, 2016

निमिटा


इस से पहले कि
रंग बिखरने से दूर क़ही
एक कोलाहल हो
जमीं पर पलों के बीच
अनकहा स्पंदन हो
मन का टूटना जरुरी सा
क्यों होता है
ताकि बरस पर बरस बीत जाएँ
उसे फिर याद करके
एक तार में पिरोने के लिए

शनिवार, अगस्त 01, 2015

तुम्हारी मुस्कराहट

देखना जिंदगी भी पानी के साथ मिल
जर्रे जर्रे में एक दिन मिल जाएगी
और फिर वहीँ दूर तक तुम्हारी मुस्कराहट
नमी में घुल कर समां में बिखर जाएगी
तुम मौसम हो अब तो ये मुझ को भी
खबर है मगर देखना बेखुदी तेरी एक दिन
तुझ कों ही शाम ढले मय्यसर हो जाएगी
आती है रात हर शाम के बाद, ये तो शायद
हर काफ़िर कों भी पता है, पर शायद अब से
वो रात कुछ और तन्हा हो जाएगी, मगर
जिंदगी की ये नेमत है की वो फिर
बारिश बन कर कुछ धूल बनती यादों को
पानी में बहा ले जाएगी .............................

सोमवार, जुलाई 27, 2015

सपने

आज नयी सुबह फिर मेरे आँगन में आई है
आज फिर आँखों से उसकी मुस्कराहट देखो
प्यालियो के उठते धुंए में कैसे सिमट आई है
खुशबू भोर कि लिपटी हैं इस घर के हर कोने में
और कुछ मैंने भी सपनों की लुबान सुलगाई है
तारे समेटने है अभी आँगन से मुझे पर क्यों
ये सुबह की खुशबू तेरे हाथों से मेरे चेहरे पर
किसी छोटी सी दुनिया की तरह सिमट आई है
सच कितने खूबसूरत होते है सुबह के सपने
क्या हुआ अगर ये सिर्फ सपने ही हैं .............

रविवार, जुलाई 12, 2015

चलो

आओ आज शाम फिर उस राह पर चले
अपने पुराने सपनों से मिले और उसी
झील के किनारे सूरज को ढलता देखे
आओ आज शाम फिर एक दुसरे का
हाथ थामे उस पगडंडी पर चले और
चाय कि प्याली के धुंए को फिर से
दोनों साथ में साँझा करे .................